5 best आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग | adhyatmik prerak prasang in hindi

आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग : हमने आध्यात्म और ईश्वर से संबंधित अनेक भक्ति भरा प्रेरक प्रसंग पहले की प्रस्तुत किया है. जिसे आप लोगों ने बहुत अधिक पसंद किया. आज हमने आप लोगों के लिए मजेदार ज्ञानवर्धक आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत किया है.

जो आपके व्यक्तित्व विकास के लिए तथा मानसिक शांति की दृष्टि से लाभदायक होगा. इसलिए कृपया करके इस प्रेरक प्रसंग को पूरा पढ़ें –

1. ईश्वर का अस्तित्व आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग

किसी गुरुकुल में एक जिज्ञासु शिष्य को ईश्वर के अस्तित्व को लेकर संशय था. कि क्या वास्तव में ईश्वर होते हैं ?

एक दिन उस शिष्य ने अपने शंका के समाधान के लिए गुरूजी से पूछ ही लिया – गुरूजी।।।।। क्या कोई ईश्वर के होने का प्रमाण दे सकता है?

गुरूजी शिष्य के इस बात से बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने शिष्य से कहा – जाओं एक कटोरी में दूध लेकर आओं.

जिज्ञाषा से भरा शिष्य दौड़ा-दौड़ा गया और एक कटोरी दूध लाकर गुरूजी को दे दिया.

फिर गुरूजी ने दूध की उस कटोरी पर ऊँगली डाली और ऊँगली निकाल कर उस दूध को देखने लगे. यही प्रक्रिया वे हर थोड़ी देर में दोहराने लगे. जब यह प्रक्रिया करते हुए काफी देर हो गयी तब शिष्य ने पूछा – गुरूजी….. आप दूध में ऊँगली डालकर क्या देख रहे हैं ?

गुरूजी ने कहा – वत्स.. दूध में मक्खन होता है. मै बस वही ढूंढ रहा हूँ.

इस पर शिष्य ने कहा – गुरुदेव, दूध से मक्खन निकालने के लिए उसे उबालकर, जमाकर फिर मंथन करके ही मक्खन निकाला जाता है.

गुरूजी मुस्कुराए और बोले – ठीक इसी प्रकार ईश्वर इस संसार के चारो तरफ है. परन्तु वे उस मक्खन के सामान अदृश्य है. अगर उन्हें प्राप्त करना है. तो तप और साधना के मंथन द्वारा ही उन्हें प्राप्त किया जा सकता है.

शिष्य को अपने सवालों का जवाब मिल चूका था.

2. आत्मप्रशंसा आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग

महाराज ययाति अपने छोटे पुत्र का राज्याभिषेक करके कठोर तपस्या के लिए वन चले गए. उन्होंने अपने कठोर तप के बल पर अनेक वरदान प्राप्त किये. जिनमे से एक यह था कि वे पुरे ब्रम्हाण्ड, ब्रह्मलोक, देवलोक, इत्यादि में गमन कर सकते थे.

ययाति भ्रमण करते हुए जब भी स्वर्गलोक आया करते थे. उनके पुण्यों के कारण देवराज इंद्र को उन्हें अपने सिंघासन पर बैठाना पड़ता था. क्योंकि इंद्र ययाति को अपने से नीचा पद नहीं दे सकते थे.

इस बात से इंद्र को बहुत अधिक चीड़ थी. वे किसी प्रकार से ययाति को स्वर्ग में आने से रोकना चाहते थे, स्वर्ग से बहिस्कृत करना चाहते थे. स्वर्ग के अन्य देवताओं को भी ययाति का आना अच्छा नहीं लगता था.

एक दिन जब ययाति स्वर्ग आये और इंद्र के साथ उसके सिंघासन पर बैठे. इंद्र व अन्य देवताओं ने सोच लिया था कि वे आज ययाति को स्वर्ग से बहिस्कृत करके रहेंगें.

जब ययाति सिंघासन पर बैठे इंद्र ने उनकी प्रशंसा करनी शुरू कर दी. इस प्रशंसा में अन्य देवगणों ने भी हां में हां मिलाना शुरू कर दिया.

इंद्र बोले – महाराज।।। मुझे यह जानने की इक्षा है कि आपने कौन सा तप किया जिसके कारण आपको यह गुण प्राप्त है की आप कहीं भी आ जा सकते हैं.

ययाति अपने प्रशंसा से बड़े खुश हुए. वे पूरी तरह इंद्र के जाल में फस गए थे. और अपने गुणों का बखान करने लगे कि मेरे सामान किसी अन्य ने तपस्या नहीं की है. ना ही मेरे जैसा कहीं भी आने जाने का गुण किसी को प्राप्त है.

बस और क्या था ययाति के सभी गुण आत्मप्रशंसा के कारण प्रभाव शून्य हो गए और वे स्वर्ग से बर्खास्त हो गए.

० आत्मप्रशंसा प्रेरक प्रसंग का तात्पर्य यह है कि – आत्मप्रशंसा व्यक्ति के सभी गुणों को नष्ट कर देता हैं. इसलिए अपनी शिक्षा और ज्ञान की प्रशंसा व घमण्ड ना करें.

3. कृष्णं वन्दे जगत गुरु आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग इन हिंदी

महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात जब युधिष्ठिर का राज्याभिषेक संपन्न हुआ. श्री कृष्ण राज्याभिषेक के पश्चात पुनः द्वारिका लौटने की तैयारी में थे. उन्होंने सभी पांडवों समेत बन्धु-बान्धवों को प्रणाम किया. जब वे कुन्ती के पास प्रणाम करने पहुंचे और उनसे जाने की आज्ञा मांगी.

कुन्ती ने कहां कि – मै आपसे एक वरदान की इक्षा रखती हूँ. कृष्ण बोले कि … अब तुम्हारी कौन सी इक्षा बांकी रह गई है. इस पर कुन्ती ने कहा – हे कृष्ण,, अगर आप मुझे वरदान दे सकते हैं. तो एक वरदान दीजिये कि हमें हमारे विपत्ति के दिन वापस ला दीजिये.

इस बात पर श्री कृष्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ उन्होंने कहाँ कि,, ये आपने कैसा विचित्र वरदान माँगा है.

तब कुन्ती ने कहा कि… जब-जब हमारा बुरा समय था तब-तब हमे आपका पूर्ण रूप से सहयोग प्राप्त हुआ. आप भगवान् स्वरुप होते हुए भी संकट के समय में.. कभी मित्र बनकर, कभी सलाहकार बनकर, कभी सहयोगी बनकर तो कभी मार्गदर्शक बनकर, हर दृष्टि से हमें सहयोग दिया

मार्गदर्शन दिया और इतने बड़े युद्ध में जो कि केवल मेरे पुत्रों की शक्ति से जितना असंभव था. उस युद्ध में भी आपने हमें विजय दिलाई. हर समय आपका सहयोग प्राप्त हुआ.

इसी कारण भीष्म को भी आपको प्रणाम तथा “जगद्गुरु” कहना पड़ा. वास्तव में आपने इन सब रूपों से भी सबसे बड़े स्वरुप सतगुरु का रूप अपनाकर रक्षा की है. जो कार्य किये हैं. वो वन्दनीय है.

हमें केवल हर समय आपका साथ चाहिए, आपके बिना ना जाने हमारे दुःख के दिन कितने बड़े होते, सायद दुःख समाप्त होता या ना होता ?

परन्तु इन सब के पीछे का तात्पर्य यह है कि गुरु अपने शिष्य के साथ रहकर शिष्य के मुश्किल से मुश्किल समय को भी समाप्त कर देते हैं. इसलिए,,, हे कृष्ण – हमें केवल दुःख चाहिए और दुःख में आपका साथ….

इसीलिए कृष्ण जी को कहा गया है “कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं

4. व्यर्थ की जिज्ञासा – आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग

एक बार एक शिष्य गौतम बुद्ध के पास आकर बोला,,, भगवान आप ने आज तक यह नहीं बताया कि मृत्यु के पश्चात पूर्ण बुद्ध रहते हैं या नहीं?

इस पर बुद्ध बोले – हे शिष्य… मुझे यह बताओं कि भिक्षु होते समय क्या मैने तुमसे यह कहा था कि तुम मेरे ही शिष्य बनना?. शिष्य ने कहा नहीं गुरुवेद.

बुद्ध बोले – यदि किसी व्यक्ति के शरीर पर अचानक एक विषैला बाण आकर लगे और तब वह यह कहे कि बाण मारने वाला किस जाती का है, जब तक पता नहीं चलेगा तब तक ना तो मै बाण निकलूंगा और ना ही इलाज़ कराऊंगा. तब इस स्थति में क्या होगा, शिष्य तुम ही बताओ.

शिष्य बोला – इस स्थिति में तो उसकी मृत्यु हो जाएगी गुरुदेव। बुद्ध बोले – अब तुम ठीक कह रहे तो वह व्यर्थ का हठ करेगा तो मारा जायेगा. इस समय बाण मारने वाला से अधिक जिम्मेदार वह व्यक्ति होगा जो व्यर्थ की जिद के लिए बाण नहीं निकलेगा.

उसी प्रकार तुम शिष्य हो तुमने ज्ञान अर्जित की है. तुम्हे जितना ज्ञान मिला है उसका अनुसरण करो, उसे आचरण में लाओ, इसी से तुम्हारा कल्याण होगा तुम व्यर्थ की चिंता क्यों करते हो.

“संशयात्मा विनष्यते” अर्थात संशय आत्मा को नष्ट कर देती है. इसलिए जीवन को संशय रहित रखें.

5. विश्वास और विजय आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग

श्वेत मुनि भगवान् शिव के परम भक्त थे. वे पर्वतों के निर्जन गुफाओं में अटल आत्मविश्वास के साथ शिव उपासना किया करते थे. एक दिन वे रुद्राध्यायी का पाठ कर रहे थे कि सामने एक विकराल आकृति देखकर चौंक पड़े. देखा कि यमदूत उन्हें लेने पंहुचा है.

श्वेत मुनि ने यमदूत को नमस्कार किया फिर अपने पूजा में लीन हो गए. यमदूत ने उन्हें टोका और पूजा में लगातार विघ्न डालते रहे. श्वेत मुनि ने यमदूत को समझाया – मै मृत्युंजय महाकाल की आराधना कर रहा हूँ. ऐसे में बार-बार पूजा में विघ्न डालना ठीक नहीं होगा.

परन्तु अपने कार्य से मजबूर यमदूत मुनि के बातों को सुनने के लिए तैयार नहीं था. उसने मुनि से कहा कि… शिव लिंग शक्ति शून्य है. पत्थर में शिव की कल्पना करना मूर्खता है. अतः मै प्रतीक्षा नहीं कर सकता, तुम जल्दी मेरे साथ चलो.

श्वेत मुनि बोले,,, मै तुम्हारी बातों से सहमत नहीं हूँ. अगर विश्वास किया जाए तो पत्थर में भी परमात्मा है. क्योंकि ईश्वर को कण-कण में है. मुनि की बातों से यमदूत को गुस्सा आ गया. उसने अपनी तलवार निकाल ली.

तलवार निकालते ही श्वेत मुनि के विश्वास स्वरुप पत्थर से भगवान् प्रकट हुए. शिव को साक्षात् सामने देख यमदूत भागखड़ा हुआ. मृत्यु को सामने देखकर भी श्वेत मुनि का विश्वास कम नहीं हुआ.

विश्वास से विजय आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग से तात्पर्य यह है कि – विश्वास करो और अपने विश्वास पर अटल रहो. परिणामस्वरूप विजय जरूर मिलेगी (केवल विश्वास और…… विजय)


उम्मीद है कि आपको आध्यात्मिक प्रेरक प्रसंग (adhyatmik prerak prasang in hindi) अच्छी लगे. इस प्रसंग को दोस्तों के साथ अवश्य shear करें.

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