10 जबरजस्त ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग | gyanvardhak prerak prasang in hindi

ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग : छोटे-छोटे प्रेरक प्रसंग हमारे दिशाहीन जिंदगी को नई-नई दिशाएं दे जाते हैं तथा निराश मन में उम्मीदे भर देते हैं. नीचे इसी प्रकार के 10 जबरजस्त ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत है. जो कहने को तो लघुरूप में हैं परन्तु उतने ही अधिक मजेदार ज्ञानवर्धक और प्रेरणा से भरपूर प्रेरक प्रसंग हैं.

1. जेंटलमैन – ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग

बात उस समय की है जब स्वामी विवेकानंद जी प्रथम बार विदेश यात्रा पे गए. वहां उनके स्वागत करने के लिए कोई व्यक्ति नहीं था. विवेकानन्द जी पूरी तरह भगवा कपडे पहने हुए थे. उनके माथे पर पगड़ी बंधी हुई थी.

जब वे रास्ते से गुजर रहे थे, उन्हें एक विदेशी दंपत्ति ने देखा और स्त्री ने मजाक में कहा – “देखो जेंटलमैन को”

विदेश में पैंट-शर्ट पहनने वाले को जेंटलमैन कहा जाता था. विवेकानंद जी के विचित्र पहनावे को देखकर उस स्त्री ने हसी उड़ाई थी. यह बात स्वामी जी के कानों तक सुनाई दे गयी.

जब वे स्त्री-पुरुष विवेकानन्द जी के पास से निकले, तब स्वामी जी ने कहा…. बहन इधर आते वक्त आपने मुझे देखकर यह कहा – “देखो इस जेंटलमैन को”

स्त्री ने स्वीकार किया और बोली – आपका विचित्र पहनावा को देखकर मैने परिहास किया था.

इस पर विवेकानंन्द जी बोले – आपने यह कहा, इसका मुझे कोई दुःख नहीं है. ना ही कोई क्षोभ है. परन्तु इस शब्द के प्रति हमारे जीवन में जो दृष्टि है. उसे स्पष्ट कर रहा हूँ.

बहन।। आपके यहाँ जेंटलमैन का निर्माण दर्जी करता है. परन्तु हमारे यहाँ जैनटलमैन का सृजन संत करता है. अपने विचारों में सुंदरता लाने के बाद ऐसा होता है.

आपके देश में व्यक्ति दर्जी द्वारा सिले कपडे पहन कर बाहर निकलता है और अंदर से भले ही कुछ भी ना हो, फिर भी वह जैनटलमैन कहलाता है.

हमारे देश में व्यक्ति कैसा भी कपडा पहने अगर वह अंदर से संस्कारी होता है. तो वह जैनटलमैन अर्थात सज्जन कहलाता है. आपके और मेरे विचार में जैनटलमैन की व्याख्या का बस इतना ही फर्क है.

“हमारी भारतीय संस्कृति महान है”

2. सिकंदर महान की गुरु भक्ति – प्रेरक प्रसंग

विश्व विजेता सिकंदर महान अपने गुरु अरस्तु का बहुत आदर करता था. उनकी द्वारा दी गई शिक्षाओं पर हमेसा अमल करता. सिकंदर के लिए अरस्तु के शब्द, शब्द नहीं मानों बल्कि पत्थर के लकीर हुआ करते थे. वे कभी भी अपने गुरु के बातों को नहीं टालते, सदैव उनकी आज्ञा का पालन किया करते.

एक दिन गुरु-शिष्य दोनों पैदल भ्रमण कर रहे थे. प्राकृति का आनंद लेते हुए, भ्रमण करते-करते वे एक गहरे नाले के पास पहुंचे. अरस्तु के दिल में भी अपने शिष्य के लिए अथाह प्रेम था. वे सिकन्दर से बोले – सिकन्दर,,, नाले को पहले मै पार करूँगा उसके बाद तुम पार करना. मै देख लूँ कि आखिर नाले की गहराई कितनी है.

परन्तु सिकंदर के दिल में कुछ और ही था, उसने प्रथम बार गुरु के आज्ञा का उलंघ्घन करते हुए, गुरु से पहले ही नाला पार कर लिया. सिकंदर के इस हरकत पर अरस्तु ने नाराज होकर पूछा – सिकंदर,, तुमने आज तक मेरी आज्ञा को सिर आंखों पर लिया, सदैव मेरी बात मानी, परन्तु आज ऐसा क्यों किया.

सिकंदर ने विनयपूर्वक वाणी से कहा – गुरुदेव,, अगर नाला पार करते समय आपको कुछ हो जाता तो मै ऐसा गुरु दोबारा कहाँ पाता. परन्तु यदि मै नाले में डूब जाता तो आप अपने ज्ञान से हजारो सिकंदर खड़ा कर देते.

यह थी सिकंदर महान कि अपने गुरु के प्रति महान गुरुभक्ति.

3. सत्संग का प्रभाव

चित्रांगद, जो मगध के राजा थे. वे अपने प्रजा का विशेष ख्याल रखते थे. उन्होंने अपने राज्य में अनेक चिकित्सालय, विद्यालय, और अनाथालयों का निर्माण करवाया ताकि कोई भी व्यक्ति शिक्षा, चिकित्सा और आश्रय से वंचित ना रहे.

एक दिन अपनी प्रजा के सुख-दुःख का पता लगाने के लिए वे अपने मंत्री के साथ दौरे पर निकले, उन्होंने गाव, शहर और खेतों का भ्रमण करके विभिन्न प्रकार की समस्याओं को जाना, राजा ने सभी को आश्वासन दिलाया की उनकी चिंताओं और समस्याओं का जल्द से जल्द निदान किया जायेगा.

एक दिन राजा किसी जंगल से गुजर रहे थे. तब उनको एक तेजस्वी संत से मिलने का मौका मिला. संत एक छोटी सी कुटिया में रहते थे और क्षात्रों को पढ़ाते हुए सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत करते थे.

राजा ने संत को सोने की मोहरें भेट करनी चाही, संत ने राजा से कहा – राजन,,, हम इसका क्या करेंगें? इसे आप गरीबों में बाट दीजिये, राजा ने जानना चाहा कि आश्रम में धन की आपूर्ति कैसे होती है.

संत बोले – हम स्वर्ण रसायन से ताम्बें की वस्तुओं को सोना बना देते हैं. राजा आश्चर्य में पड़ गया. उसने कहा – अगर आप वह दिव्य रसायन मुझे उपलब्ध करा दें तो मै राज्य को वैभवशाली बना सकता हूँ.

संत ने कहा – इसके लिए आपको एक माह तक हमारे साथ सत्संग करना होगा, तभी स्वर्ण रसायन बनाने का तरीका आपको बताया जायेगा.

राजन लगातार सत्संग पर आते रहे…. जब एक माह बीत गया तब एक दिन संत ने कहा – राजन अब आप स्वर्ण रसायन बनाने का तरीका जान लीजिये.

राजा बोले – गुरुदेव, अब मुझे स्वर्ण रसायन की आवश्यकता नहीं है, आपने मेरे हृदय को ही अमृत रसायन बना डाला है.

सीख : सत्संग से हमेसा ज्ञान के नए-नए दरवाजे खुलते हैं.

4. जीवन का सत्य

भगवान् बुद्ध के जीवन में एक महिला अपने मृत बच्चे को लेकर उसके पास आई और कहा – “आप मेरे बच्चे को जीवित कर दीजिये”. बुद्ध कह सकते थे कि मृत प्राणी जीवित नहीं हो सकता, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं कहा.

उन्होंने कहा कि – मै उसे जीवित कर दूंगा परन्तु एक शर्त पर, तुम किसी ऐसे घर से एक मुट्ठी सरसों ले आओ जिस घर में कभी किसी की मृत्यु ना हुई हो.

वह महिला दिन भर घर-घर, दरवाजे-दरवाजे भटकती रही, परन्तु सरसों प्राप्त ना कर सकी. उसे कोई भी व्यक्ति सरसों देने के लिए तैयार नहीं हुआ क्योंकि ऐसा कोई घर ही नहीं था जहाँ किसी की मृत्यु ना हुई हो.

वह बुद्ध के पास वापस लौट गई, और बोली – प्रभु,,, मै समझ गई की प्राणी की मृत्यु निश्चित है. बुद्ध यदि कहते कि उसके मृत पुत्र को जीवित नहीं किया जा सकता है, तो वह निरास और हतास हो जाते, सदमा लगता, दुखी होती, और स्पष्ट रूप से कहे गये सत्य ज्ञान को नहीं समझ पाती.

जब वही बात इस ठंग से कही गई तो महिला को सत्य का ज्ञान हो गया.

दुनिया में ऐसे अनेक लोग है, जो चाहते हैं कि कोई बाबा, कोई सिद्ध पुरुष उसके सिर पर हाँथ रख दे और उसके सारे काम पुरे हो जाए. जब वे चाह रहे हैं कि हमें ज्ञान और सच्चाई को ग्रहण करना चाहिए, तो हम इस बात को क्यों समझ नहीं पाते.

5. ज्ञान का दीपक

रात का अंधकार वातावरण को अपने आवरण में छुपाने लगा था, शाम के प्राथना के पश्चात गुरु ने अपने एक प्रमुख शिष्य को पुस्तक देते हुए कहा कि इसे आश्रम के भीतर प्रकोष्ट में रख आये.

शिष्य पुस्तक लेकर भीतर गया किन्तु तुरंत ही लौट आया और घबराये हुए स्वर में बोला – “गुरुदेव, भीतर सांप है”

गुरुदेव बोले – कोई बात नहीं, मै तुम्हे सांप भगाने का एक मन्त्र देता हूँ, तुम अंदर जाकर इसका उच्चारण करो. जिससे सांप खुद ब खुद भाग जायेगा.

शिष्य ने वैसा ही किया।। वह थोड़ी देर बाद वापस आया और बोला – गुरुदेव, सांप तो अपनी जगह से हिला भी नहीं.

गुरुदेव बोले – कोई बात नहीं, शायद तुमने मन्त्र का उच्चारण श्रद्धा पूर्ण नहीं किया हो. ऐसा करों एक बार फिर जाओ और पुरे मन से मन्त्र का जाप दोबारा करो.

जैसी आज्ञा गुरुदेव, कहकर शिष्य अंदर चला गया…. फिर वापस आकर बोला, गुरुदेव सांप तो वैसे का वैसे ही पड़ा है. भगने का नाम ही नहीं ले रहा.

ओह,,,, गुरुदेव ने कहा – तुम दीपक अंदर लेकर जाओ वह सांप खुद ब खुद भाग जायेगा.

शिष्य दीपक लेकर अंदर गया. थोड़ी देर बाद वापस आकर बोला – अंदर तो साप था ही नहीं गुरुदेव, वह तो केवल एक रस्सी थी, जो अँधेरे में मुझे एक सांप के सामान प्रतीत हो रही थी.

गुरूजी बोले – शिष्य, इसी प्रकार पुरे संसार पर भ्रम छाया हुआ है, जिसे ज्ञान रूपी दीपक और शिक्षा से ही दूर किया जा सकता है. भ्रम का तात्पर्य होता है. सत्य पर असत्य का आवरण, यह भ्रम तब तक दूर नहीं हो सकता, जब तक ज्ञान रूपी आवरण हमारे पास ना हो.

6. परोपकार क्या है

एक बार आदि शंकराचार्य समुद्र के किनारे बैठे हुए थे. उनकी शिष्य मण्डली में से एक चाटुकार शिष्य उनके पास आया और कहने लगा – गुरुदेव आपने इतना अधिक ज्ञान कैसे प्राप्त किया होगा, यह सोचकर हमें आपपर आश्चर्य और गर्व होता है.

शंकराचार्य ने उससे कहा – तुम्हे किसने कहा की मेरे पास ज्ञान का भंडार है.

शिष्य का सर शर्म से झुक गया, यह वार्तालाप सुनकर अन्य शिष्य भी उनके पास आ गए. शंकराचार्य जी ने अपने शिष्यों को अपने ज्ञान का अहंकार उत्पन्न ना हो. यह समझाने के लिए अपने हाँथ में एक पतली टहनी लेकर उसे समुद्र में डुबोया.

कुछ देर बाद बाहर निकाला और शिष्य से पूछा – इसने कितना पानी ग्रहण किया. कुछ शिष्यों ने कहा – कुछ भी नहीं, कुछ ने कहा – मात्र कुछ बून्द.

शंकराचार्य ने कहा – मै भी ज्ञान के सागर में डुबकी लगाता हूँ. और बाहर निकलने पर मुझे अनुभूति होती है. कि मै कितना कम जानता हूँ. मै लगातार ज्ञान ग्रहण करने की कोशिस करता रहता हूँ.

सच्चा ज्ञानी व्यक्ति ज्ञान की सीमा जानता है. इसी कारण उसमे अहंकार जन्म नहीं ले पाता, अल्पज्ञ अपने आप को सर्वज्ञानी समझकर अहंकारी हो जाता है.

मनुष्य में ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता का कभी अंत नहीं होता, ज्ञान की कोई सीमा नहीं है, हमें हर समय कुछ ना कुछ ग्रहण करते रहना चाहिए. ज्ञान एक ऐसा समुद्र है जिसमे जितना प्राप्त होगा उतना ही कम है. अतः ज्ञान का सदुपयोग परोपकार में हो अहंकार उत्पन्न करने में नहीं.

7. मनुष्य का आभूषण

प्रख्यात दार्शनिक सुकरात शक्लसूरत से कुरूप था, वह रोज आईने में अपना चेहरा देखा करता था. एक दिन वह आईने में अपना चेहरा देख रहा था कि उसका शिष्य सामने खड़ा हुआ और अपने गुरु को आईने में चेहरा देखता देखकर मुस्कुरा उठा.

सुकरात शिष्य के मुस्कुराने का कारण समझ गया, वह बोला “मै तुम्हारे मुस्कुराने का कारण समझता हूँ” तुम इसलिए मुस्कुरा रहे हो ना कि मै कुरूप हूँ और आईने में बड़े गौर से अपना चेहरा देख रहा हूँ. मै ऐसा रोज करता हूँ.

शिष्य मौन होकर खड़ा रहा. उसे अपनी गलती का एहसास हो गया था. उसका सिर शर्म से झुका रहा. वह क्षमा मांग पाता इससे पहले ही सुकरात बोला – आइना देखने से मुझे मेरी कुरूपता का आभास होता रहता है. मै अपने रूप से भली भांति परिचित हूँ.

इसलिए प्रयत्न करता रहता हूँ कि मुझसे हमेसा अच्छा काम होता रहे. मै समाज की भलाई में लगा रहता हूँ ताकि अच्छे कामों से मेरी कुरूपता ढक सके

शिष्य बोला – गुरूवार,,, इसका तात्पर्य तो यह हुआ कि रूपवान लोगों को आइना देखना ही नहीं चाहिए.

गुरूजी बोले – ऐसी बात नहीं है. आइना उन्हें भी देखना चाहिए, परन्तु इसलिए कि उन्हें याद रहे वे जितने सुन्दर तन से हैं उतना ही उनका मन भी सुन्दर होना चाहिए, उन्हें सदैव भलाई का कार्य करते रहना चाहिए.

व्यक्ति के गुणों एवं अवगुणों का संबंध रूपवान तथा कुरूप होने से नहीं बल्कि अच्छे व बुरे विचारो व कामों से हैं. अच्छा काम करने से रूपवान और सुन्दर लगने लगते हैं. बुरे काम उनके रूपवान व्यक्तित्व पर ग्रहण जैसे होते हैं.

8. मनोबल ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग

एक विद्यार्थी बड़ी कंडी मेहनत करता था. रात को देर तक दीपक के प्रकाश में पढता रहता, अगर तेज नींद लगती तो थोड़ी देर आराम करता फिर पढ़ने लग जाता, उसके श्रम को देखकर विद्या की देवी प्रसन्न होकर उसके सामने उपस्थित हुई. विद्यार्थी ने उन्हें प्रणाम किया.

देवी ने पूछा – क्या तुमने मुझे पहचान लिया ?

विद्यार्थी बोला – हाँ में चिन्हों से पहचान गया कि आप देवी स्वरस्वती हो.

देवी बोली – तुम्हारे लगन और श्रम से मै बहुत प्रसन्न हूँ. तुम्हे सारी विद्याएं देना चाहती हूँ.

बड़ी ख़ुशी की बात थी परन्तु विद्यार्थी ने सर हिलाकर मना कर दिया, उसने कहा – माँ. मुझे नहीं चाहिए, मुझे अभी पात्रता नहीं है. पात्रता के बिना विद्या लूंगा तो उसका सदुपयोग होगा. वह पात्रता मेरी तपस्या मेरी साधना और मेरी लगन से ही मुझमे आएगी.

अपात्रता की स्थति में ढेर सारी विद्याओं को लेकर मै उसका तिरस्कार और अपमान करना नहीं चाहता.

देवी बोली – विद्यार्थी मै तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ. मै तुम्हे कुछ देना चाहती हूँ, बोलो तुम क्या चाहते हो.

विद्यार्थी बोला – माँ,,, तुम देना ही चाहती हो तो मुझे वरदान दो. विद्या प्राप्ति के मार्ग में आने वाले कष्टों से मै विचलित ना होऊं. इससे बड़ा दुनिया में कोई वरदान नहीं है. इस दुनिया में कोई भी प्राणी जन्म ले और उसे कष्ट ना हो. यह कभी संभव नहीं हो सकता, समझदारी इसी में है कि अपने कष्टों से विचलित ना हुआ जाये.

9. लगन से मिलती है मंजिल

संस्कृत भाषा में पाणिनी के कठिन व्याकरण को सुगम बनाकर जिस “मुग्धबोध” नामक संस्कृत व्याकरण की रचना महापंडित बोपदेव जी ने की, उनके गुरुकुल जीवन का एक ज्ञानवर्धक प्रसंग है –

बोपदेव की स्मरण शक्ति बहुत कम थी, बहुत कोशिस के बावजूद भी व्याकरण के शुत्र उन्हें याद नहीं होते थे. उनके सहपाठी भी उन्हें चिढ़ाते थे. इन सब से परेशान और दुखी होकर बोपदेव एक दिन गुरुकुल से भाग खड़े हुए.

चलते-चलते रास्ते में उन्हें कुआ दिखाई दिया, जो ऊपर से पत्थर का बना हुआ था. उस कुए पर गांव के लोग जल भरा करते थे. कुए पर रस्सी के मदद से जल भरा जाता था. जिस कारण पत्थरों पर अनेक गठ्ढ़े जैसा निसान बन गया था.

बोपदेव ने सोचा।। एक मुलायम रस्सी के बार-बार रगड़ के कारण पत्थरों पर अनेक गठ्ठे जैसा निसान बन गया है. और जिस पत्थर पर महिलाएं घड़ा रखती थी वहां पर भी गड्ढा बना हुआ है.

बोपदेव ने मन ही मन सोचा,,, जब मुलायम रस्सी और मिटटी के घड़े की बार-बार रगड़ लगने से पत्थर में गड्ढा बन सकता है. तो निरंतर और दृढ अभ्यास से क्या मै विद्वान नहीं बन सकता हूँ.

ऐसा विचार करके बोपदेव तुरंत गुरुकुल की ओर लौट पड़े, वे आश्रम में दुगना उत्साह के साथ जुट गए और सच्ची लगन व सतत अभ्यास के कारण आगे चलकर सुप्रसिद्ध विद्वान बन कर राजदरबार के महापंडित बने.

प्रेरक प्रसंग से तात्पर्य : लगन, विश्वास, धैर्य, हिम्मत हो तो प्रत्येक संघर्ष में सफलता जरूर मिलती है.

10. जैसा अन्न वैसा मन्न

भीष्म पितामह बाणों की सैया पर लेटे-लेटे उपदेश दे रहे थे.

द्रौपती ने कहा – पितामह,,, इस समय आप ज्ञान, धर्म, ध्यान, योग, कर्म इत्यादि की अत्यंत प्रेरक बाते कर रहे हैं. यदि आपकी अनुमति हो तो आपसे एक प्रश्न करूँ.

अवश्य – पितामह बोले,

द्रौपती ने कहा, प्रश्न कड़वा है, कदाचित आप वह दृश्य ना भूले होंगे जब दुःशासन मुझे खींचता हुआ ले गया था. कर्ण ने मुझे वैश्या कहा था और दुर्योधन ने मुझे भरी सभा में नग्न करने का प्रयत्न किया था. मै गिड़गिड़ा रही थी. उस समय आपकी आंखों में पट्टी क्यों बंध गई थी?

“पुत्री” पितामह बोले – जैसा अन्न वैसा मन्न, उस समय मै दुर्योधन का पापयुक्त अन्न खाता था. तब मै ज्ञान और कर्तव्य की बाते नहीं कर सका. क्योंकि मेरी धमनियों में अपवित्र रक्त दौड़ रहा था. अब अर्जुन के बाणों ने अपवित्र रक्त को शरीर से बाहर निकाल दिया है. फलतः मै ज्ञान धर्म और कर्म की बाते कर रहा हूँ.

प्रेरक प्रसंग से सीख : व्यक्ति का मन स्वाभाव, उसके ग्रहण किये अन्न के सामान होता है. व्यक्ति जिस प्रकार का अन्न ग्रहण करेगा उस प्रकार का उसका वयक्तित्व बनेगा.

आखिर मे

आशा है आपको हमारा यह लेख – दस ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग (yanvardhak prerak prasang in hindi) पसंद आये. अगर प्रसंग अच्छी लगी हो तो इसे दोस्तों के साथ अवश्य शेयर करें,

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