6 भक्ति भरा प्रेरक प्रसंग, हिंदी कहानियां | Devotional Inspirational Story in hindi

प्रेरक प्रसंग हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. सदियों से हम प्रेरक किस्से, कहानियों, कथाओं, से शिक्षा लेते हुए आ रहें है और इसे अपने जीवन में उतार कर हमने अपने जीवन को कई बार सफल बनाये हैं, यह हमारे एनर्जी जोश उत्साह, सकारात्मकता के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण ज्ञान है।

इस लेख में हमने कुछ भक्तिमय प्रेरक प्रसंगों के संग्रह को आपके सामने प्रस्तुत किया है जो आपके और हमारे जीवन के लिए राम बाण साबित हो सकती  है।

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विषय-सूची

1. दरिद्र शिव भक्त की परीक्षा : भक्ति भरा प्रेरक प्रसंग

एक बार माता पार्वती ने भूखे भक्त को श्मशान के चिता की अग्नि पर रोटी सेंकते हुए देखा। माता पार्वती की हृदय पूरी तरह पसीज गया। वे भागी-भागी भगवान शंकर के पास आयी और भगवन से कहने लगी लगता है आपका हृदय बहुत ही कठोर है, जो अपने भक्त की यह दशा देख कर भी नहीं पसीज रहा हैं। 

हे प्रभु, कुछ नहीं तो कम से कम इतना तो कर सकतें है, की अपने भक्त की भोजन की उचित व्यवस्था कर देते। देखिये वह किस दशा में है अपने कितने दिनों की भूख को मृतक को पिंड में दिए गए आटे की रोटियां बनाकर शांत कर रहा है। 

भगवान शंकर हंसते हुए कहने लगे – ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्धार हमेशा खुला हुआ है। परन्तु वे आना ही नहीं चाहते हैं, यदि कोई वस्तु उन्हें दी जाए तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं अब ऐसी स्तिथि में हे पार्वती तुम ही बताओ मै क्या करूँ। 

फिर माता पार्वती बोलीं – प्रभु क्या आपके भक्तों को पेटपूर्ति के लिए भोजन की आवश्यकता भी नहीं होती। 

भगवान शंकर बोले ‘ हे प्रिये परीक्षा लेने की तो तुम आदि हो’ यदि विश्वास नहीं है तो स्वयं जाकर पता कर लो।

परन्तु मेरे भक्त की सावधानी से परीक्षा लेना। 

भगवान शंकर का आदेश पाते ही माता पार्वती भिखारिन वृद्धा का वेशभूषा बनाकर शिवभक्त के पास पहुंची और बोली – बेटा मै कई दिनों से भूखी हूँ, क्या मुझे भी कुछ खाने को दोगे। 

भक्त बोला अवश्य माते, और जो चार रोटियां बनाई थी उसमे से दो रोटी उस वृद्ध औरत को दे दिया और बचे दो रोटी को स्वयं खाने के लिए आशन लगाकर बैठ गया। 

वृद्धा बोली बेटा इन दो रोटियों से कैसे काम चलेगा ? मै अकेली नहीं हूँ बेटा, मेरा एक बूढ़ा पति भी है जो कई दिनों से भूखा है। कृपा करके उसके लिए भी कुछ दे दो 

शिवभक्त ने उन दो रोटियों को भी उस भिखारिन को दे दिए और वे बड़े ही संतोष थे की उनकी वजह से अधिक भूखे व्यक्ति को खाना मिल सका। भक्त ने अपने कमण्डल से जल पिया और आत्मसंतोष के साथ वहां से जाने लगे।

वृद्ध भिखारिन बोली – वत्स तुम कहाँ जा रहे हो, भक्त ने पीछे मूड कर देखा। माता पार्वती अपने वास्तव रूप में आयीं और भक्त से बोली की मै तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हे जो वरदान चाहिए वो मांग लो। 

भक्त ने उन्हें प्रणाम किया और बोला – अभी तो अपनी और अपनी पति की क्षुधा सांत करने हेतु मुझसे रोटी मांग कर ले जा रही थी। जो स्वयं दूसरों के समक्ष अपना हाँथ फैलाकर अपना पेट भरता है वह मुझे क्या दे सकता है, ऐसे भिखारी से भला क्या मांगूं। 

भक्त ने श्रद्धा पूर्वक माता के चरणों में सिर झुकाकर कहा – हे माँ आप प्रशन्न ही हैं तो मुझे यह वर दें की मुझे जीवन में जो कुछ भी मिले उसे दिन-दुखियों में लगाता रहूं, और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शांतिपूर्वक रह सकूँ। 

पार्वती माता भक्त को तथास्तु कहते हुए वापस लौट गयी। त्रिकालदर्शी भगवान शंकर सब देख रहें, उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, हे पार्वती – मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते की उन्हें कुछ नहीं मिलता। भक्ति से जुडी उनकी उदारता उन्हें अत्यधिक दान कराती है और वे खाली हाँथ रहकर भी अधिक सम्पत्तिवानों से भी अधिक संतुष्ट रहते हैं।  

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2. सबसे बड़ा भक्त कौन – बिरजू किसान का भक्तिमय प्रेरक प्रसंग

देवर्षि नारद जी, जो हर समय भगवान विष्णु के साधना में लगे रहतें है, और उनके मुख से हर वक्त नारायण-नारायण का जाप निकलता ही रहता है।

नारद जी को एक दिन अपनी भक्ति पर बड़ा ही घमंड हो गया, उन्होंने भगवान विष्णु (नारायण) से एक दिन निवेदन किया कि हे प्रभु इस संसार मेरे जैसा कोई भक्त नहीं होगा आपका। 

इस बात पर भगवान नारायण ने कहा की, ऐसा नहीं है देवर्षि नारद, आपसे भी कोई बड़ा भक्त है मेरा जो धरती लोक पे रहता है और उसका नाम बिरजू है।  

नारद जी को इस बात पर बहुत गुस्सा आया वे सोचने लगे की ऐसा कैसे हो सकता है, इसका जरूर पता लगाना पड़ेगा। और वे स्वयं धरती लोक में जाकर इस बात का पता लगाने के लिए मन बना लिए, जब नारद जी धरती लोक में जाकर देखा तो आश्चर्य चकित रह गए। 

बिरजू एक साधारण सा किसान था, जो सुबह जल्दी उठता और बिना नहाये धोये बासी मुँह में ही नौ दस बार नारायण नारायण का जाप करता और फिर अपने बैलों को लेकर खेत चला जाता।   

खेत में हल चलाते-चलाते मन करता तो नारायण का एकाक भजन गुनगुना लेता, फीर शाम होने पर घर आता और घर के जरूरी काम सब्जी लाना, बच्चों की बात सुनना आदि काम निपटाता और बिना आरती पूजा किये खाना खाकर सोने चला जाता। सोने से पहले एक बार नारायण का नाम अवश्य ले लेता।

अब नारद जी का सोंच इधर-उधर होने लगा, वे सोचने लगे की होना हो यह रात में उठकर जरूर कोई विशेष प्रकार की पूजा अर्चना करता होगा तभी तो नारायण भगवान इसे अपना सबसे बड़ा भक्त मानते हैं। अब इस चीज़ का पता लगाने के चक्कर में नारद जी वही रात भर खड़े रहे।   

परन्तु बिरजू तो रात में उठा ही नहीं, वह सीधे सुबह उठा और अपनी दैनिक दिनचर्या के हिसाब से काम में लग गया। नारद जी सोचने लगे की आज नहीं तो कल सहीं पर जानकर ही रहूँगा की आखिर यह किसान बिरजू कौन सी विशेष पूजा अर्चना करता है।

इस सोंच में नारद जी वहां थोड़े दिन रह कर पता करने लगे। पर बिरजू की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।   

अंत में थक हार कर गुस्से से तिलमिलाये नारद जी सीधा विष्णु जी के पास पहुंचे। और विष्णु जी से बोले की हे प्रभु, आप ने तो मेरा अपमान ही कर डाला, कहाँ वह अनपढ़ किसान जो नहाता तक नहीं है, बासी मुँह से आपका नाम लेता है, और आपकी पूजा अर्चना भी नहीं करता उसे आप अपना सबसे बड़ा भक्त कहतें है, यह तो बहुत बड़ा अन्याय है प्रभु।   

विष्णु जी नारद की बातों पर मुस्कुराये, और नारद जी से कुछ नहीं बोले। कुछ दिन बाद विष्णु जी ने नारद जी को एक बड़ा सा कटोरा दिया, जो पूरा तेल से भरा हुआ था।

और नारद जी से बोले, की इस घड़े से एक भी बून्द तेल का गिराए बिना, पुरे ब्रह्माण्ड का एक चक्कर लगाकर आओ। और ध्यान रहे की तेल का एक भी बून्द नहीं गिरना चाहिए।   

नारद जी बेचारे क्या करते तैयार हो गए, कटोरे से तेल न छलक जाये इसे ध्यान में रखते हुए, बड़ी सावधानी से, ब्रम्हांड का चक्कर लगाने लगे, और सात दिनों बाद पूरा चक्कर लगाकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे।

और विष्णु जी से बोले की हे भगवन, संभालिये अपने इस तेल के कटोरे को, मैंने इसे इतनी सावधानी से लाया है की इसमे से तेल का एक बून्द भी नहीं गिरा है।   

विष्णु जी बोले, ये तो बहुत अच्छी बात है, पर मुझे ये बताइए की इन सात दिनों में आपने कितनी बार मेरा नाम लिया। नारद जी बोले, प्रभु, मै आपका नाम लूँ या इस तेल के कटोरे पे ध्यान दू, मेरा पूरा ध्यान इस बात पे था की कहीं तेल का एक बून्द भी न गिर जाये, इसलिए मुझे इन सात दिनों में एक बार भी आपके नाम लेने का मौका नहीं मिला।   

भगवन बोले, बिरजू किसान तो गृहस्थ जीवन के सारे कार्य करता है। उसे पूरा दिन हजारों काम करने होते है, पचासों तनाव से गुजरता है। फिर भी वह दिन में कम से कम एक बार मेरा नाम लेता है।

और हे नारद तुम्हारे हाँथ में तो केवल एक तेल का कटोरा था, और तुम मेरा नाम लेना ही भूल गए। अब तुम ही निर्णय करों की सबसे बड़ा भक्त कौन है ?

भक्तिमय प्रेरक प्रसंग से ज्ञान 

इस कहानी का तात्पर्य तो आप समझ ही गये होंगे ठीक इसी प्रकार हाल हमारे जीवन में भी है। हजारों मुश्किलों को झेलते हुए भी जो अपने लक्ष्य पे डटा रहता है उससे बड़ा कौन हो सकता है। 

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3. राधा का कृष्ण के प्रति प्रेम – प्रेरक प्रसंग ज्ञानवर्धक हिंदी कहानी 

एक समय की बात है नारद मुनि जी नारायण-नारायण करते हुए तीनो लोकों का भ्रमण कर रहे थे। भ्रमण करते हुए उन्होंने देखा की तीनो लोकों में राधा की जयजयकार हो रही है।

उन्होंने सोंचा कि मै खुद कितना बड़ा हरी भक्त हूँ हर वक्त नारायण-नारायण का जाप करता रहता हूँ। मेरा श्री कृष्ण के प्रति जो अटूट प्रेम है वो भी किसी से छुपा नहीं है परन्तु केवल राधा का चारों दिशाओं और तीनो लोकों में स्तुति (गुणगान) हो रहा है। 

नारद जी अपने मन में इस दुविधा को लिए हुए श्री कृष्ण के पास आ पहुंचे, पहुंचकर उन्होंने देखा कि श्री कृष्ण जी सिर दर्द से कराह रहें है। देवर्षि नारद के हृदय में टीस उठी उन्होंने पूछा –

भगवन, क्या इस दर्द का कोई उपचार नहीं है, मुझसे आपकी यह दशा देखी नहीं जा रही है, कृपा करके इसका उपाय बताएं अगर मेरे हृदय के रक्त से इस दर्द का इलाज हो पाए तो वह भी बताएं।

श्री कृष्ण जी बोले – मुझे रक्त की आवश्यकता नहीं है। हाँ अगर मेरा कोई भक्त अपना चरणोदक (किसी भक्त के चरण से धुला हुआ पानी) पीला दे तो यह दर्द, वेदना शांत हो सकता है। 

नारद जी सोंच में पड़ गए कि – ‘ भक्त का चरणोदक भगवन के श्री मुख में। ‘

आखिरकार नारद जी रुक्मिणी के पास पहुंचे और सारा हाल कह सुनाया। इतने में रुक्मिणी जी बोली, नहीं-नहीं देवर्षि नारद जी, मै यह पाप नहीं कर सकती। 

नारद जी अब क्या करते वापस श्री कृष्ण के पास पहुंचे और भगवन को रुक्मिणी की बातों को कह सुनाया। 

भगवन चुप थे, बस दर्द से कराह रहे थे – नारद जी बोले ‘ भगवन क्या कोई अन्य उपाय नहीं है। 

भगवन बोले – नहीं नारद और कोई अन्य उपाय नहीं है। 

थोड़ी देर बाद भगवन बोले – नारद ऐसा करो तुम एक बार राधा के पास चले जाओ। 

नारद जी तुरंत राधा के पास चले गए और उन्हें श्री कृष्ण का सारा हाल बताया। 

नारद जी की इन बातों को सुनकर राधा की आँखे भर आयी और उन्होंने तुरंत एक जल से भरा पात्र मंगवाया और उसमे अपने दोनों पाँव डूबा दिए। 

ये देख महर्षि नारद जी ने कहा – राधा क्या तुम्हे पता है की इस जल को भगवन को पिलाने से तुम्हे पाप भोगना पड़ेगा। 

राधा बोली आप इस जल को तुरंत ले जाइये और मेरे कृष्ण को पीला दीजिये, मुझे पता है इसके लिए मुझे नर्क में भी जगह नहीं मिलेगा और मुझे अनेक यातनाये झेलनी पड़ेगी। परन्तु मै अपने कृष्ण की सुख के लिए अनत काल तक दुःख और यातना भोगने के लिए तैयार हूँ। 

राधा की इन बातों को सुनकर नारद जी निरुत्तर हो गए और श्री कृष्ण के पास आ पहुंचे, श्री कृष्ण को चरणोदय दिए और राधा की सारी बातों को कह सुनाया। 

यह तो केवल भगवन की लीला थी। 

उन्होंने नारद जी से कहा – नारद यह काम तो तुम भी कर सकते थे, आखिर तुम भी तो मेरे भक्त हो। 

देवर्षि नारद जी की आँखे नीची थी, उन्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था कि तीनो लोकों में राधा की स्तुति क्यों हो रही थी। 

इस कहानी का तात्पर्य केवल और केवल ज्ञान बाटना है किसी प्रकार की धार्मिक आहत करना नहीं। 

भक्तिवर्धक प्रेरक प्रसंग से सीख 

ऐसा है राधा का कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम जो कृष्ण के खुशी के लिए युगों-युगों तक यातनाएं भोगने के लिए तैयार हो गयी। अगर किसी के प्रति आपका निस्वार्थ प्रेम होता है तो वहां सिर्फ देने की बात होती है लेने की नहीं। और जहाँ  लेना-देना व स्वार्थ हो वहां प्रेम कैसा – वह तो एक व्यापार हो गया। 

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4. ब्रह्मचारी का अहंकार : भक्तिमय प्रेरक प्रसंग

एक समय की बात है, एक बौद्ध ब्रम्हचारी थे उन्होंने कई देशों में घूमकर अलग-अलग कलाएं सीखी। एक देश में जाकर उन्होंने किसी व्यक्ति से बाण बनाने की कला सीखी। कुछ दिनों बाद वे फीर किसी अन्य देश गए वहां अधिक मात्रा में नांव बनाये जाते थे तो उन्होने नाव बनाने की कला सीखी। 

फीर वे किसी तीसरे देश में गए और वहां गृह निर्माण की कला सीख ली। इसी तरह वह ब्रम्हचारी सोलह देशों में गया, और सभी देशों से अलग-अलग कला सीखकर अंत में अपना देश आया।

परन्तु जब वह आपना देश पंहुचा तो वह अहंकार से ग्रस्त हो चूका था। वह सभी लोगों से कहता रहता की इस दुनियां में मुझ जैसा बुद्धिमान व चतुर व्यक्ति कोई नहीं है। 

भगवान बुद्ध ने उस अहंकार से भरे ब्रम्हचारी को उच्चतर कला सिखानी चाही और भगवान बुद्ध एक वृद्ध भिखारी का वेश बनाकर हाँथ में भिक्षा पात्र लेकर उसके पास गए। 

ब्रम्हचारी ने बड़े ही अभिमान से पूछा – कौन हो तुम। 

बुद्ध बोले – मै आत्म विजय का पथिक हूँ। 

ब्रम्हचारी को समझ नहीं आया, उसने इस सब्द का अर्थ जानना चाहा। 

बुद्ध बोले  – इसुकार बाण बना सकता है। नावचालक नाव पर नियंत्रण रख सकता है। और गृह निर्माता घर भी बना लेता है, परन्तु वह तो महा विद्धान ही होगा, जो अपने सरीर व मन पर विजय सके। 

चाहे संसार उसकी प्रशंसा करे या उसे अपशब्द कहे दोनों ही दशाओं में जिसका मन स्थिर रहे वही शांति को प्राप्त करता है। 

गौतम बुद्ध की इन बातों को सुनकर ब्रम्हचारी को अपनी भूल का अहसास हुआ। 

प्रेरक प्रसंग से प्राप्त ज्ञान

कहानी का तात्पर्य यह है की हम किसी से थोड़ा बहुत भी ज्यादा जान लेते है तो हमे अपने ऊपर अहंकार हो जाता है की जैसे हम ही सबसे बड़े ज्ञानी है बाकि सब हमारे तुक्ष है।

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5. साधना का मार्ग भक्तिभरा ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग : हिंदी कहानी 

एक व्यक्ति को महान गुरु की तलाश थी, उसके दिमाग में हजारों प्रश्न उठते थे। जिसका हल जानना व्यक्ति के लिए बहुंत जरुरी था, परन्तु उसके प्रश्नो का हल कोई नहीं कर पा रहा था। 

एक दिन वह इसी तलाश में भटकता हुआ एक संत के पास पंहुचा। संत बहुत ही शांत सौम्य और तेज़ से भरा हुआ था। व्यक्ति इससे प्रभावित हुआ और संत के सामने अपने प्रश्न रखे। संत ने भी प्रश्न पूछने की आज्ञा दे दी। 

व्यक्ति – हे प्रभु, मै कौन सी साधना करूँ। 

संत बोले – तुम अपने मन में बैठा लो की मय भगवान के लिए दौड़ रहा हूँ, और जोर से दौड़ते रहो, यही तुम्हारी साधना है।

व्यक्ति बोला – तो क्या बैठकर करने के लिए कोई साधना नहीं है। 

संत बोले – बिल्कुल है, तुम बैठो और यह ठान लो की तुम भगवान के लिए बैठे हो। 

व्यक्ति ने फीर प्रश्न किया – हे प्रभु, कोई जप वगरा न करें। 

संत बोले – किसी भी नाम का जप कर लो, और सोचों की जप भगवान के लिए कर रहा हूँ। 

व्यक्ति से फिर सवाल उठाया – तो क्या क्रिया का कोई महत्व नहीं है, केवल भाव ही साधना है।

संत ने समझाया – क्रिया की भी महत्ता है, क्रिया से भाव और भाव से ही क्रिया होती है। इसलिए नजर हमेसा लक्ष्य पर होनी चाहिए, फिर जो करोगे वही साधना है। 

प्रेरक प्रसंग के सीख

कहानी का तात्पर्य यह है की कार्य जो भी करो अगर ठान लेते हो की मुझे इस लक्ष्य के लिए कार्य करना है या मुझे इस चीज़ में मन लगाना है, तो चाहे आप सोते जगते उठते बैठते उस चीज़ में मन लगा सकते हो।

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6. समुद्र टापू पर फंसे व्यक्ति की ज्ञानवर्धक कहानी – भक्तिभरा प्रेरक प्रसंग

एक अमीर और बहुत ही भला व्यक्ति था , जो समुद्र में अकेले घूमने का खूब शौकीन था। उनसे समुद्र में घूमने के लिए एक नाव बनवाई, और जब छुट्टियों का दिन आया तब वह अपनी नाव को लेकर समुद्र में घूमने निकला। घूमते-घूमते वह व्यक्ति समुद्र में बहुत दूर तक निकल गया। 

फिर अचानक ही एक तूफ़ान आया, व्यक्ति उस तूफ़ान में बुरी तरह फंस गया। तूफ़ान ने उस व्यक्ति के नाव को बुरी तरह-तहस नहस कर दिया। पर वह व्यक्ति जैसे-तैसे लाइफ जैकेट के मदद से अपनी जान बचाने में कामयाब हो गया।

और जब तूफ़ान शांत हुआ तो वह तैरता हुआ एक टापू में पहुंचा, परन्तु व्यक्ति ने देखा कि वहां कोई भी दूसरा इंसान नहीं है, चारो तरफ समुद्र ही समुद्र और बीच में एक सुनसान टापू। 

वह व्यक्ति निराश हो गया और सोचता रहा, कि जब मैने पूरी जिंदगी किसी का बुरा नहीं चाहा तो मेरे साथ एसा क्यों हुआ। 

फीर उस आदमी को लगा की ऊपर वाले ने मुझे बचाया तो सहीं। और जब उसने बचाया है तो वही मुझे रास्ता दिखायेगा और मुझे इस टापू से बाहर भी निकालेगा। 

धीरे-धीरे उस व्यक्ति ने उस टापू पे उगे झाड़-पत्ते व फल-फूल खाकर अपना दिन बिताने लगा। व्यक्ति को लगा की अब वह यहीं फंस कर रह जाएगा, इसलिए उसका ईश्वर पर से विश्वास उठने लगा। उसे लगने लगा की इस दुनियाँ में ईश्वर है ही नहीं। वह सोंचा कि जब पूरी जिंदगी इस टापू पर ही रहना है तो क्यों न एक झोपडी बना लिया जाए। 

फिर उस व्यक्ति ने पत्तों, लकड़ियों व झाड़ियों को इकट्ठा कर एक छोटी सी झोपडी बनाई, वह अंदर से बहुत खुश हुआ कि कम से कम अब झोपडी में आराम से सो सकेगा।

परन्तु जैसे ही रात होने को आयी अचानक मौषम बदल गया, बहुत तेज़-तेज बिजली कड़कने लगी। और बिजली की कड़क उस झोपडी पर आकर गिरी, और देखते ही देखते झोपडी में आग जलने लगी। 

यह देख व्यक्ति बुरी तरह से टूट गया और बहुत ही ज्यादा गुस्से से आसमान कि तरफ देखकर बोला ”तू कैसा भगवान है, तू मुझे अच्छे से सोते हुए भी नहीं देख सकता। तू भगवान नहीं राक्षस है राक्षस। तुझमे दया नाम की चीज़ ही नहीं है। तू बहुत ही क्रूर है।

और बेचारा व्यक्ति अपना सिर पकड़कर घोर निराशा के साथ बैठ गया और उसके आँखों से अश्रु बहने लगे। 

फीर अचानक एक नाव उस टापू के पास आयी। नाव से दो व्यक्ति उतरे और बोले कि हम तुम्हे बचाने आए हैं, हमने दूर से इस वीरान टापू में आग जलते हुए देखा तो हमे लगा की कोई व्यक्ति मुसीबत में है।

यह तुमने बहुत बढ़िया किया कि झोपडी में आग लगा दी, जिससे हम तुम्हे देख पाए। अगर तुम आग न लगाते तो हमे पता ही नहीं चलता और हम इस टापू में नहीं आते। 

उस व्यक्ति के आँखों में एक बार फिर आँशु थे। उसे अपना जवाब मिल गया था। वह मन ही मन बहुत दुखी था कि उसने ईश्वर को भला-बुरा कहा। 

प्रेरक प्रसंग सीख देती है

तात्पर्य यह है कि “जब हम चाहे तब तक ख़ुशी मिले तब तक तो ठीक है और हमारे जिंदगी में जब जरा सी भी मुशीबत या परेशानी आ जाये तो सब चीज़ से भरोशा ही उठ जाता है। हम चाहते है की सब हमारे इक्षा अनुसार ही हो – आप ही बताइये क्या यह ठीक है। 

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