भारत देश में नगरीय प्रशासन का विकास | छत्तीसगढ़ में नगरीय प्रशासन व्यवस्था

नमस्कार दोस्तों, इस लेख में हम भारत में नगरीय प्रशासन व्यवस्था (Urban Administration in India) व छत्तीसगढ़ में नगरीय प्रशासन के विकास को विस्तार से जानेगे – हम ऐसे देश यानि भारत के निवासी हैं जहाँ की सुरुवात ही नगरीय प्रशासन से हुई थी। आप लोग जान ही गए होंगे की मै हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की बात कर रहा हूँ, हालांकि इनके पतन के बाद भारत में ग्रामीण सभ्यता का विकास हुआ। परन्तु हम जहा से अपने इतिहास को प्रारम्भ करते हैं तो हम पाते हैं की हमारी सुरुवात नगरीय सभ्यता से ही शुरू हुई हैं। हमारे आज के नगरीय प्रशासन व्यवस्था को समझने के लिए हमारे कल के इतिहास को भी समझना बहुत ही जरुरी हैं तो चलिए देर ना करते हुए भारत देश की नगरीय प्रशासन के बारे में जानते हैं। 

विषय-सूची

ब्रिटिश काल के समय भारत में नगरीय प्रशासन 

आप सभी जानते ही हैं कि भारत में नगरीय व्यवस्था प्राचीन काल से ही निर्मित है पर क्या आप जानते हैं की इसे क़ानूनी रूप कब दिया गया। इसका उत्तर है भारत के नगरीय व्यवस्था को क़ानूनी रूप सर्वप्रथम सन 1687 में दिया गया। और ब्रिटिश सरकार द्वारा मद्रास शहर के लिए नगर निगम संस्था की स्थापना की गयी। 

इस तरह भारत का पहला नगर निगम मद्रास के रूप में मिला। बाद में सन 1793 के चार्टर अधिनियम के तहत मद्रास कलकत्ता तथा बम्बई के तीनो महानगरों की स्थापना की गयी। 

फिर बाद में सन 1842 में बंगाल अधिनियम पारित किया गया। वर्ष 1882 में तत्कालीन गवर्नर वायसराय लार्ड रिपन थे जिन्होंने नगरीय शासन व्यवस्था में सुधार लाने का विशेष प्रयास किया परन्तु कुछ राजनैतिक कारणों से वह अपने इस कार्य में असफल रहे। 

नगरीय प्रशासन के विकेन्द्रीकरण पर रिपोर्ट देने के लिए सन 1909 में साही विकेन्द्रीकरण आयोग का गठन किया गया इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर भारत सरकार अधिनियम 1919 में नगरीय प्रशासन के सम्बन्ध में विसिष्ट प्रावधान किया गया।

भारत में स्वतंत्रता के बाद नगरीय प्रशासन 

पहले मूल सविधान में नगरीय शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में कोई भी प्रावधान नहीं था परन्तु बाद में इसे सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में शामिल करके यह तय कर दिया गया कि इसके सम्बन्ध में कानून केवल राज्य ही बना सकता है। 

इस कानून के तहत नगरीय शासन के संचालन के लिए जिन निकायों को गठित करने के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया वे हैं –

  1. नगर निगम 
  2. नगर पालिका 
  3. नगर क्षेत्र समितियां 
  4. अधिसूचित क्षेत्र समिति 
  5. छावनी परिसद 

नगरीय प्रशासन के सवैधानिक प्रावधान व 74 वा संविधान संशोधन 

22 दिसंबर सन 1992 को लोकसभा ने व 23 दिसंबर को राज्यसभा ने 74 वां संविधान संशोधन पारित किया फिर 20 अप्रैल 1993 को राष्ट्रपति ने इसे अनुमति प्रदान की और 1 जून 1993 में यह पुरे भारत देश में लागु हो गया। 

इसके द्वारा संविधान में भाग 9-क के अंतर्गत नए अनुच्छेद (243 त से 243 य छ तक) एवं 12 वी अनुसूची जोङकर कुछ प्रावधान किये गए जो नीचे हैं –

  1. अनुच्छेद 234 त – परिभाषा 
  2. अनुच्छेद 243 थ – नगर पालिकाओं का गठन 
  3. अनुच्छेद 243 द – नगर पालिकाओं की संरचना 
  4. अनुच्छेद 243 ध – वार्ड समितियों का गठन वा संरचना 
  5. अनुच्छेद 243 न – स्थानों का आरक्षण 
  6. अनुच्छेद 243 प – नगर पालिकाओं की अवधि इत्यादि 
  7. अनुच्छेद 243 फ – सदस्यता के लिए निर्हरताये 
  8. अनुच्छेद 243 ब – नगरपालिकाओं की शक्तियां, प्राधिकार और उत्तरदायित्व 
  9. अनुच्छेद 243 भ – नगरपालिकाओं द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्ति और उनकी निधियां 
  10. अनुच्छेद 243 म – वित्त आयोग 
  11. अनुच्छेद 243 य – नगरपालिकाओं की संपरीक्षा 
  12. अनुच्छेद 243 य क – नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन 
  13. अनुच्छेद 243 य ख – संघ राज्य क्षेत्रों को लागु होना। 
  14. अनुच्छेद 243 य ग – इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागु ना होना 
  15. अनुच्छेद 243 य घ – जिला योजनाओं के लिए समिति 
  16. अनुच्छेद 243 य ड – महानगर योजना के लिए समिति 
  17. अनुच्छेद 243 य च – विध्यमान विधियों पर नगर पालिकाओं का बना रहना 
  18. अनुच्छेद 243 य छ – निर्वाचन सम्बंधित मामलों में न्यायालयों के हस्तछेप का वर्णन 

संविधान की बारहवीं अनुसूची (Twelfth schedule of constitution)

इसके अनुसार शामिल विषयों के सम्बन्ध में राज्य विधानमंडल कानून बनाकर नगरीय संस्थानों को अधिकार एवं दायित्व सौप सकता है –
  1. नगरीय योजना (शहरी योजना भी शामिल)
  2. भूमि उपयोग का विनिमय और भवनों का निर्माण 
  3. आर्थिक और सामाजिक विकास की योजना 
  4. सड़के और पुल 
  5. घरेलु औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रयोजनों में निमित्त जल की आपूर्ति 
  6. लोक स्वास्थ्य, स्वस्छता, सफाई व कूड़ा-कचरा का प्रबंधन 
  7. अग्निशमन सेवाएं 
  8. समाज के कमजोर वर्ग (विकलांग और मानशिक रूप से मंद व्यक्ति शामिल) के हितों का संरक्षण 
  9. नगरीय वानिकी, पर्यावरण का संरक्षण व पारिस्थितिक पहलुओं की अभिवृद्धि 
  10. गन्दी बस्तियों में सुधार
  11. नगरीय निर्धनता में कमी 
  12. नगरीय सुख सुविधाओं, जैसे पार्क उद्यान, खेल का मैदान इत्यादि की व्यवस्था 
  13. सांस्कृतिक शैक्षणिक और सौन्दर्यपरक पहलुओं की अभिवृद्धि 
  14. कब्रिस्तान, शव गाड़ना, श्मशान और शवदाह व विद्युत शवदाह 
  15. पशु तालाब व जानवरों के प्रति क्रूरता को रोकना 
  16. लोक सुख सुविधाएं (पथ-प्रकाश, पार्किंग स्थल, बस-स्टाप, लोक सुविधा सहित 
  17. वध सालाओं तथा चर्म शोधनशालाओं का विनियमन  

छत्तीसगढ़ में नगरीय प्रशासन (Urban Administration in Chhattisgarh)

  • नगर पालिका निगम – 13, वार्ड 688 
  • नगर पालिका परिषद् – 44 वार्ड 864 
  • नगर पंचायत – 111 वार्ड 3217 
  • कुल नगरीय निकाय – 168 वार्ड 4769 

नगर पालिका निगम (municipal Corporation in hindi)

  • महापौर व वार्डों के पार्षद का प्रत्यक्ष चुनाव 
  • इसके अलावा विशेष अनुभव रखने वाले 6 सदस्य को राज्य सरकार नामांकित कर सकती है जिसे एल्डरमैन कहा जाता है। 
  • लोक सभा सांसद, विधायक जिनका क्षेत्र पूर्ण अथवा आंशिक रूप से नगर पालिका निगम के क्षेत्र में आता है या उनके प्रतिनिधि। 
  • राज्य सभा सदस्य जो उस नगरपालिका निगम के क्षेत्र में मतदाता सूची में पंजीकृत हो। 
  • एल्डरमैन का कार्यकाल शासन के विवेकाधिकार पर होता है उनकी निश्चित अवधि निर्धारित नहीं है। 
  • बैठकों में मतदान का अधिकार केवल महापौर और निर्वाचित पार्षदों को है। 
  • किसी भी नगरपालिका निगम में वार्डों की न्यूनतम संख्या 40 एवं अधिकतम संख्या 70 हो सकती है परन्तु 10 लाख से अधिक जनसँख्या वाले निगमों में वार्डों की संख्या 85 तक हो सकती है। 

नगर पालिका निगम में स्थानों का आरक्षण किस प्रकार है ? 

  • ऐसे वार्डों को आरक्षित किया जायेगा जहाँ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की संख्या सर्वाधिक हो। 
  • जिन निगमों में 50% या उससे कम स्थान आरक्षित है तो कुल आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग के अनुपात में 50% आरक्षण होने तक अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए उनके जनसँख्या के आरोही क्रम में स्थान आरक्षित किये जायेंगे। 
  • अगर अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित किसी वार्ड में कोई नामांकन फाइल नहीं होता है तो कलेक्टर उसे अनारक्षित वार्ड घोषित कर सकता है। 
  • कुल स्थानों का एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित रहेगा, और यह आरक्षण क्षैतिज आरक्षण होगा। 
  • महापौर के पदों का आरक्षण – कुल निगमों के महापौरों के पदों में से उस संख्या में महापौर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रखे जायेंगे जो राज्य के सभी नियमों के सीमाओं अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति की अनुपात में होगा। महापौर के पदों में ये यथा संभव 25% अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित किये जायेंगे महापौर के पदों में भी एक तिहाई का महिलाओं के लिए क्षैतिज आरक्षण होगा। 
  • नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में भी आरक्षण की प्रक्रिया नगर निगम के सामान ही होगा। 

मतदान करने के लिए योग्यता (Eligibility to vote)

उम्र 18 वर्ष होना चाहिए व वह निगम के किसी वार्ड का निवासी हो। 
 

महापौर/पार्षद के निर्वाचन के लिए अयोग्यत 

  • अगर उम्र 25 वर्ष से कम है तो वह महापौर के लिए योग्यता नहीं रखता व 21 वर्ष से कम होने पर पार्षद के लिए। 
  • अगर कोई व्यक्ति जमाखोरी, मुनाफाखोरी, खाद्य और औसधि अपमिश्रण या दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम इनमे से किसी भी का दोषी पाया गया हो तब वह योग्यता नहीं रखता। 
  • दिवालिया होने पर 
  • पागल व्यक्ति 
  • सरकारी नौकरी व अन्य सरकारी लाभकारी पद पर होने पर 
  • एक वर्ष से अधिक समय से निगम का कर्जदार हो 
  • विद्युत मंडल का कर्ज 6 माह से ना चुकाया हो 
  • अगर वोटर लिस्ट में नाम ना हो तो 
  • निर्धारित समय के अंदर कलेक्टर के समक्ष सपथ लेना अनिवार्य है, अगर बिना संभागीय आयुक्त की अनुमति के महापौर या पार्षद 3 माह तक सपथ ना ले तो उसका निर्वाचन स्वतः ही समाप्त हो जायेगा और पद फिर से रिक्त हो जायेगा। 

अध्यक्ष/सभापति (स्पीकर) (Speaker/Chairman)

  • महापौर एवं पार्षदों की निर्वाचन की अधिसूचना के पंद्रह दिन के भीतर कलेक्टर की उपस्थिति में आयोजित बैठक में गुप्त मतदान द्वारा पार्षदों में से एक अध्यक्ष निर्वाचित किया जायेगा। 
  • अध्यक्ष का काम निगम के सम्मेलनों की अध्यक्षता करना है, अध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्ष द्वारा नामांकित 2 पार्षदों में से एक सम्मलेन कि अध्यक्षता करता है। 
  • अध्यक्ष का कार्यकाल निगम के कार्यकाल के बराबर होगा। 
  • अध्यक्ष के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है। 
  • अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव – निगम के पार्षदों की कुल संख्या के 1/3 सदस्यों द्वारा कलेक्टर के हस्ताक्षर युक्त अनुरोध करने पर कलेक्टर द्वारा 10 दिनों के भीतर पूर्व सूचना देकर निगम को विशेष सम्मिलन आहूत किया जायेगा इस सम्मिलन में उपस्थित तथा मतदान करने वाले निर्वाचित पार्षदों के 2/3 बहुमत से तथा कुल पार्षदों के आधे से अधिक सदस्यों द्वारा अध्यक्ष को हटाए जाने का प्रस्ताव पारित होने पर अध्यक्ष का पद रिक्त हो जायेगा अध्यक्ष का पद ग्रहण करने से 2 वर्ष के भीतर अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता। 

महापौर, अध्यक्ष या पार्षद को हटाने की प्रक्रिया 

अगर राज्य सरकार की राय में महापौर या अध्यक्ष का पद पर बने रहना लोकहित व नियमहित में ठीक नहीं है या वह अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रहा है तब राज्य सरकार उसे सुनवाई का अवसर देने के पश्चात पद से हटाने का आदेश पारित कर सकती है। पार्षद के लिए भी यही नियम लागु होगा। 
 

महापौर द्वारा त्यागपत्र (Resignation by mayor)

लिखित में त्यागपत्र देने पर राज्य सरकार उसे स्वीकार कर सकती है 
 

अध्यक्ष वा पार्षद का त्यागपत्र (Resignation of Chairman or Councilor)

अध्यक्ष या पार्षद महापौर को या सीधे संभागायुक्त को त्यागपत्र प्रस्तुत कर सकते हैं। 
 

महापौर को वापस बुलाने की प्रक्रिया (The process of recalling the mayor)

निर्वाचित पार्षदों के तीन चौथाई यदि हस्ताक्षर युक्त अनुरोध प्रस्तुत करते हैं तो वापस बुलाने के लिए गुप्त मतदान कराया जायेगा और यदि निगम क्षेत्र के कल मतदाताओं को आधे से अधिक वापस बुलाने के पक्ष में मतदान करते हैं तो महापौर का पद रिक्त हो जायेगा यह प्रक्रिया महापौर के पद धारण करने के दो वर्ष के भीतर प्रारम्भ नहीं की जाएगी। 
 

नगरपालिका निगम की अवधि (Municipal corporation period)

प्रथम सम्मिलन से 5 वर्ष यदि किसी पद की रिक्ति निगम का कार्यकाल 6 माह से अधिक रहने पर होती है तभी उन पद के लिए कार्यकाल की शेष अवधि हेतु निर्वाचन कराया जायेगा। 
 

पार्षदों के कर्त्तव्य (Councilor’s duties in hindi)

  • निगम के सम्मेलनों में उपस्थित होना तथा अजेंडा में शामिल विषयों पर अपना पक्ष रखना तथा वोट देना। 
  • निगम के किसी योजना क्रियावनाय में कमी अथवा निगम को होने वाली हानि के प्रति आयुक्त अथवा सम्बंधित अधिकारी का ध्यान आकृत करना। 
  • आयुक्त अजेंडा तैयार कर महापौर को प्रस्तुत करेगा और महापौर के अनुमोदन के बाद अध्यक्ष को भेजेगा 
  • अध्यक्ष अजेंडा के विषयों के साथ सम्मिलन की सुचना सभी पार्षदों को भेजवायेगा। 
  • विशेष सभा – पार्षदों को 1/3 के लिखित आवेदन पर विशेष सभा बुलाई जाती है। 
  • कोरम – पार्षदों की कुल संख्या का 1/3 कोरम है कोरम के आभाव में आगामी बैठक की तिथि एवं समय निर्धारित करके अध्यक्ष बैठक स्थगित कर देगा स्थगित बैठक में कोरम की आवश्यकता नहीं होती 
  • सम्मलेन में सामान्य व्यवस्था बनाये रखने का दायित्व अध्यक्ष का है 

मेयर इन काउंसिल (Mayor in council)

  • पार्षद एवं अध्यक्ष के निर्वाचन होने के 7 दिन के भीतर महापौर निर्वाचित पार्षदों में से उनकी संख्या में से 20 प्रतिशत के बराबर सदस्यों को लेकर मेयर इन काउन्सिल गठन करेगा इसमें कम से कम में 5 और अधिक से अधिक में 10 सदस्य होंगे। 
  • मेयर इन काउन्सिल में कम से कम 1 सदस्य अनुसूचित जाति या अनुसूचित जन जाति वर्ग से होगा कम से कम 1 अन्य पिछड़ा वर्ग से होगा और कम से कम एक महिला सदस्य होगी। 
  • मेयर इन काउन्सिल के सदस्य महापौर के प्रसाद पर्यन्त कार्य करेंगे। 
  • इन सदस्यों को विभिन्न विभागों का प्रभारी बनाया जा सकता है। 
  • मेयर इन काउन्सिल की बैठक का कोरम आधे सदस्यों का है और निर्णय बहुमत से होता है। 
  • नगर पालिका और नगर पंचायत में इसे प्रेसिडेंट इन काउन्सिल कहा जाता है। 

सलाहकार समितियां (Advisory committees)

  • मेयर इन काउन्सिल के प्रत्येक सदस्य के विभाग हेतु अध्यक्ष सलाहकार समितियों का गठन करेगा। 
  • प्रत्येक समितियों में 7 से 9 सदस्य होंगे। 
  • मेयर इन काउंसिल का प्रभारी सदस्य प्रत्येक माह अपने विभाग की सलाहकार समिति की बैठक आयोजन करेगा। 

वार्ड समितियां (Ward committees in hindi)

  • 3 लाख से अधिक जनसंख्या वाली निगमों में न्यूनतम 3 समितिया एक लाख पर एक समिति निर्वाचित पार्षद तथा क्षेत्र में निवास करने वाले 2 व्यक्ति इसके सदस्य होते हैं। इसे महापौर नामांकित करते हैं यह राज्य सरकार द्वारा निर्धारित कार्य सम्पादित करती है। 

मोहल्ला समितियां (Mohalla Committees in hindi)

निगम क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड में एक मोहल्ला समितियां होती है जिसके 10 सदस्य होते हैं नगर पालिका क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड में एक समिति होती है जिसके 7 सदस्य होते हैं नगर पंचायत क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड में एक समिति होती है जिसके 5 सदस्य होते हैं। आधे सदस्य ST, SC, OBC और महिला होनी चाहिए। इसका कार्यकाल निगम के बराबर होता है। इसका कार्य मोहल्ले की विकास योजना बनाना, जनभागीदारी को प्रोत्साहन देना निगम की संपत्ति को सुरक्षित रखना आदि है। 
 

आयुक्त (Commissioner)

शासन द्वारा नियुक्त निगम का मुख्य कार्यपालन अधिकारी आयुक्त कहलाता है। निगम के सारे कर्मचारी उसके अधीन होते हैं। आयुक्त का अधिकतम कार्यकाल 5 वर्ष का है यदि किसी सम्मलेन में उपस्थित 3/4 सदस्य, आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव पारित करे तो शासन द्वारा आयुक्त को हटाया जायेगा। नगर पालिका एवं नगर पंचायत में मुख्य कार्य पालिक अधिकारी को मुख्य नगर पालिका अधिकारी कहा जाता है। 
 

निगम द्वारा अधिरोपित कर (Tax imposed by corporation)

सम्पति कर, जल कर, स्वस्छता कर, सामान्य अग्नि कर, बिक्री पर स्थानीय निकाय कर, बाजार फीस पशुओं की बिक्री पर फीस, निर्यात कर, कालोनी निर्माण पंजीकरण इत्यादि। 

नगर पालिका एवं नगर पंचायत (Municipality and Nagar Panchayat)

  • निर्वाचित पार्षदों की संख्या न्यूनतम 15 और अधिकतम 40, नगर पालिका में 4 एल्डरमेन एवं नगर पंचायत में 2 एल्डरमैन। विधायक एवं सांसद के सदस्यता प्रावधान निगम की तरह, वोट देने का अधिकार केवल निर्वाचित पार्षद को है। 
  • आरक्षण निगम की भाती। 
  • अध्यक्ष तथा पार्षद का निर्वाचन प्रत्यक्ष मतदान से होता है। उपाध्यक्ष का निर्वाचन पार्षदों द्वारा प्रथम सम्मलेन में किया जाता है। 
  • पार्षद को हटाने का अधिकार कलेक्टर को है। 
  • अध्यक्ष को वापस बुलाने का अधिकार निगम के मेयर को है। 
  • सपथ प्रथम सम्मिलन में अनुभागीय अधिकारी के समक्ष ली जाती है। निगम 
  • निगम के किसी संकल्प को राज्य शासन रद्द कर सकता है नगर पालिका और नगर पंचायत के लिए यह अधिकार कलेक्टर को है। 

आखिर में :

हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारा यह लेख भारत में नगरीय प्रशासन | छत्तीसगढ़ में नगरीय प्रशासन (bharat me nagariya prashasan in hindi | chhattisgarh me nagariya prashasan in hindi.) पसंद आए और आपके काम आये, अगर आपको यह लेख उपयोगी लगी हो तो इसे दोस्तों के साथ अवश्य shear करें, और comment box का उपयोग करते हुए अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया दें, अगर हमारे लिए कोई सुझाव या शिकायत हो तो अवश्य बताये – धन्यवाद। 
 
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